बेलवृक्ष की वह चमत्कारी रात: अनजानी शिवभक्ति से व्याध बना त्रेता का निषादराज
संचारक्रान्ति संवाददाता सिद्धार्थनगर। फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी की अंधेरी रात… चारों ओर सन्नाटा, वन में पशुओं की गर्जना और आकाश में टिमटिमाते तारे। उसी रात, जिसे आज हम महाशिवरात्रि के रूप में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाते हैं, एक ऐसी घटना घटी जिसने एक क्रूर व्याध (शिकारी) का भाग्य बदल दिया।
कथा के अनुसार, एक व्याध दिनभर शिकार की तलाश में भटकता रहा, पर उसे कुछ भी प्राप्त न हुआ। भूख और थकान से चूर वह संध्या ढलते-ढलते रास्ता भटक गया। जंगली पशुओं के भय से वह एक बेलवृक्ष पर चढ़कर बैठ गया। उसे ज्ञात न था कि उसी वृक्ष के नीचे एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है, जहाँ स्वयं भगवान शिव की अनंत कृपा विराजमान है।
भूख के कारण उसने उस दिन अन्न ग्रहण नहीं किया—अनजाने में उसका व्रत हो गया। भय से उसकी आँखों में नींद न आई—अनजाने में वह रात्रि-जागरण करता रहा। जागते रहने के लिए वह बार-बार बेलपत्र तोड़कर नीचे गिराता रहा—वे सीधे शिवलिंग पर अर्पित होते रहे। इस प्रकार बिना जाने ही उसकी पूजा पूर्ण होती रही।
रात के अंतिम प्रहर में एक गर्भवती हिरणी वहाँ पानी पीने आई। व्याध ने तीर साधा, पर हिरणी की करुण पुकार ने उसके हृदय को भेद दिया—
“मुझे अपने शावकों को जन्म देने दो, फिर लौट आऊँगी।”
उस क्षण व्याध का कठोर मन पिघल गया। उसने धनुष नीचे कर दिया। कुछ देर बाद एक और मृग आया, फिर एक और—और हर बार उसकी करुणा बढ़ती गई। वह सोचने लगा—“क्या मेरा जीवन केवल हिंसा के लिए है?”
प्रभात की लालिमा फैलते ही शिवलिंग से दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। जटाजूटधारी, त्रिनेत्रधारी भगवान शिव उसके सम्मुख प्रकट हुए। उनकी वाणी गूंजी—
“हे व्याध! तुमने अनजाने में मेरा व्रत, जागरण और पूजन किया है। पर उससे भी बड़ी पूजा तुम्हारी जागी हुई करुणा है। जिस क्षण तुम्हारे भीतर दया का संचार हुआ, उसी क्षण तुम मेरे प्रिय बन गए।”
व्याध की आँखों से पश्चाताप और कृतज्ञता के आँसू बह निकले। उसने हिंसा त्यागने का संकल्प लिया। भोलेनाथ ने आशीर्वाद दिया—
“अगले जन्म में तुम त्रेतायुग में निषाद कुल में जन्म लोगे और धर्मावतार की सेवा का सौभाग्य प्राप्त करोगे।”
कालांतर में वही व्याध त्रेतायुग में जन्म लेकर बना —
निषादराज गुह,
जिसने वनवास के समय मर्यादा पुरुषोत्तम राम को गंगा पार कराई और उन्हें सखा भाव से अपनाया।
धर्मग्रंथों में वर्णित यह कथा बताती है कि भगवान शिव केवल विधि-विधान से नहीं, बल्कि निष्कपट हृदय और करुणा से प्रसन्न होते हैं।
महाशिवरात्रि केवल उपवास और जागरण का पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और हृदय परिवर्तन का अवसर है। यदि मन निर्मल हो जाए, तो अनजाने में की गई भक्ति भी जन्मों का कल्याण कर देती है।



